ईरान और इजरायल के बीच 2026 में शुरू हुआ युद्ध दुनिया के लिए सबसे बड़ा भू-राजनीतिक संकट बन गया है। मध्य-पूर्व में बढ़ती सैन्य कार्रवाई, मिसाइल हमले और ड्रोन हमलों ने वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित किया है। इस संघर्ष में कई देश अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो चुके हैं, जिससे स्थिति और भी जटिल हो गई है।

फरवरी 2026 में इजरायल और अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इन हमलों का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना बताया गया।
इन हमलों को इजरायल ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया, क्योंकि उसे आशंका थी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर सकता है। इस अभियान को “Operation Lion’s Roar” नाम दिया गया था, जिसमें मिसाइल और एयरस्ट्राइक के जरिए ईरान के कई ठिकानों को निशाना बनाया गया।
इन हमलों के बाद ईरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताया और जवाबी कार्रवाई की घोषणा कर दी।
ईरान की जवाबी कार्रवाई
इजरायल और अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों की एक बड़ी श्रृंखला शुरू कर दी। ईरान ने इजरायल के साथ-साथ मध्य-पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को भी निशाना बनाया।
उनकी मौत ने पूरे ईरान में राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल पैदा कर दी। सरकार ने 40 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया और देशभर में सुरक्षा बढ़ा दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना ने युद्ध को और भी तीखा बना दिया क्योंकि ईरान ने इसे सीधे अपने नेतृत्व पर हमला

लेबनान और अन्य देशों की एंट्री
ईरान के सहयोगी संगठनों और देशों ने भी इस युद्ध में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। लेबनान में मौजूद हिज्बुल्लाह ने इजरायल के उत्तरी इलाकों पर रॉकेट और ड्रोन हमले किए।
इसके जवाब में इजरायल ने लेबनान के कई इलाकों पर हवाई हमले किए। इससे लेबनान-इजरायल सीमा पर भी तनाव बढ़ गया और हजारों लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हो गए।
नागरिकों पर असर
युद्ध का सबसे ज्यादा असर आम नागरिकों पर पड़ा है। कई शहरों में स्कूल, अस्पताल और आवासीय क्षेत्रों को नुकसान हुआ है।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि एक स्कूल पर हुए हमले में कई बच्चों की मौत हुई, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया।
संयुक्त राष्ट्र ने इस घटना की
जांच की मांग की Arya दोनों पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील की।
इजरायल में आपातकाल
युद्ध के खतरे को देखते हुए इजरायल सरकार ने पूरे देश में आपातकाल घोषित कर दिया।
इस दौरान स्कूल बंद कर दिए गए, बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी गई और सेना के हजारों रिजर्व सैनिकों को बुला लिया गया।
सरकार ने नागरिकों से सतर्क रहने और एयर रेड अलर्ट के दौरान सुरक्षित स्थानों में जाने की अपील की।
वैश्विक राजनीति पर असर
ईरान-इजरायल युद्ध का असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहा।
तेल की कीमतों में तेजी
अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में बाधा
वैश्विक बाजारों में अस्थिरता
मध्य-पूर्व दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है, इसलिए युद्ध के कारण तेल सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका की भूमिका
इस संघर्ष में अमेरिका की भूमिका भी अहम रही है। अमेरिका ने इजरायल का समर्थन करते हुए कई सैन्य अभियानों में सहयोग किया।
अमेरिकी सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना और ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना है।
क्या यह युद्ध और बढ़ सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कूटनीतिक समाधान नहीं निकला तो यह संघर्ष और भी बड़ा रूप ले सकता है।
मध्य-पूर्व में पहले से ही कई संघर्ष चल रहे हैं और ईरान-इजरायल युद्ध ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है।
अगर अन्य देश सीधे तौर पर इस युद्ध में शामिल हो जाते हैं तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है।
शांति की उम्मीद
हालांकि स्थिति बेहद तनावपूर्ण है, लेकिन कई देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन इस संघर्ष को खत्म करने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और कई अन्य देश दोनों पक्षों से बातचीत और युद्धविराम की अपील कर रहे हैं।
निष्कर्ष
ईरान और इजरायल के बीच चल रहा युद्ध केवल दो देशों का संघर्ष नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।
- यह युद्ध वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कूटनीति इस संघर्ष को खत्म कर पाएगी या यह और बड़ा संकट बन जाएगा।










